आ गई ट्रायल की तारीख, अब भारत में भी सीधे सैटेलाइट से मिलेगा इंटरनेट, जानिए इसके नफा-नुकसान

जियो और Oneweb इस महीने सैटेलाइट इंटरनेट का लाइव डेमो एक इवेंट में देने वाले वाली हैं. आज इस लेख में हम आपको सैटेलाइट और सामान्य इंटरनेट के बीच अंतर बताएंग.

 

The trial date has arrived, now internet will be available directly through satellite in India too, know its advantages and disadvantages

Satellite internet vs Cable Internet:भारत में जल्द सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस देखने को मिलेगी. यानी बिना तार और टावर के हमारे घरों तक हाई स्पीड इंटरनेट पहुंचेगा. इसके लिए रिलायंस जियो की सैटेलाइट शाखा और वनवेब को डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन ने लाइव डेमोंसट्रेशन की मंजूरी दे दी है. यानी दोनों कंपनियां ये बताएंगी कि कैसे सैटेलाइट इंटरनेट काम करेगा. आज इस लेख में हम आपको ये बताने वाले हैं कि सामान्य इंटरनेट या फिर केबल के माध्यम से मिल रहे इंटरनेट की तुलना में सैटेलाइट इंटरनेट कैसे अलग है, इनमें क्या अंतर है और क्या ये 5G से बेहतर होगा, साथ ही इसके फायदे और नुकसान क्या हैं, ये सब बताएंगे.  

बता दें, हाल ही में अमेजन ने भी भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस देने के लिए DOT को ऐप्लिकेशन फाइल की है. सैटेलाइट इंटरनेट की रेस में अमेजन,जियो, वनवेब और एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक उतर चुकी है.

क्या है सैटेलाइट इंटरनेट:

सैटेलाइट इंटरनेट ठीक सैटेलाइट टीवी की तरह काम करता है. ये एक वायरलेस कनेक्शन है, जो सैटेलाइट की मदद से जमीन में स्थापित डिश तक पहुंचाया जाता है और फिर मॉडेम की मदद से आपको इंटरनेट मिलता है. इसमें रेडियो वेव्स के माध्यम से कम्युनिकेशन स्थापित किया जाता है. जिस तरह अभी आप डिश टीवी को देखने के लिए एक डिश के माध्यम से नेटवर्क को कैच करते हैं, ठीक इसी तरह सैटेलाइट इंटरनेट के लिए भी एक डिश या डिवाइस आपको दी जाएगी, जिसके माध्यम से आप सीधे नेटवर्क को वायरलेस तरीके से प्राप्त कर पाएंगे. इसमें तार की जरूरत नहीं होगी. 

दोनों में क्या है अंतर:

सामान्य या केबल इंटरनेट में आपको हाई स्पीड डेटा केबल वायर के जरिए मिलता है. यानी अगर गलती से ये वायर कट या टूट जाए तो आपको इंटरनेट मिलना बंद हो जाएगा. लेकिन सैटेलाइट इंटरनेट के साथ ऐसा नहीं है. इसमें वायरलेस तरीके से इंटरनेट आप तक पहुंचाया जाता है, जिसमें तार या टावर की कोई जरूरत नहीं है. इस टेक्नोलॉजी में जमीन से सीधे स्पेस में इंटरनेट भेजा जाता है और ये सीधे आप तक डिश के माध्यम से वायरलेस फॉर्म में पहुंचता है. केबल लाइन कुछ ही जगह तक सीमित है, जबकि सैटेलाइट इंटरनेट हर जगह आपको मिलेगा. यानी अगर आपने एक शहर में कनेक्शन लिया हुआ है तो इसे आप अपने गांव में भी ले जाकर यूज कर सकते हैं.  

क्या ये 5G से बेहतर होगा:

सर्विस और स्पीड के मामले में 5G सैटेलाइट इंटरनेट से आगे है, क्योंकि इसे टॉप सेल्यूलर इंफ्रास्ट्रक्चर पर बनाया गया है. 5G तेजी से डेटा ट्रांसफर करने में सक्षम है. लेकिन ग्रामीण इलाकों में जहां 5G उपलब्ध नहीं है या नेटवर्क की समस्या है, वहां सैटेलाइट इंटरनेट बेहतर साबित होगा.

किसमें मिलेगी अच्छी स्पीड?

क्योंकि सैटेलाइट इंटरनेट अभी शुरुआती स्टेज में है इसलिए अभी इससे जुड़ी ज्यादा जानकारी सामने नहीं है. स्पीडटेस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें आपको 50 एमबीपीएस तक की डाउनलोड स्पीड और 14 से 25 एमबीबीएस तक की अपलोड स्पीड मिल सकती है. कई रिपोर्ट्स में एलन मस्क के स्टरलिंक सैटेलाइट इंटरनेट की स्पीड 200Mbps तक बताई गई है. हालांकि सामान्य इंटरनेट की बात करें तो इसमें आपको 50, 100, 200, 300 और 1gbps तक की स्पीड भी इन दिनों दी जा रही है.

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सैटेलाइट इंटरनेट के फायदे और नुकसान

फायदे की बात करें तो सैटेलाइट इंटरनेट क्योंकि एक वायरलेस नेटवर्क है इसलिए इसे कहीं से भी एक्सेस किया जा सकता है. एलन मस्क के स्टरलिंक डिश को लोग अपने साथ कहीं भी कैरी कर लेते हैं और जहां वे जाते हैं वहीं से इंटरनेट को एक्सेस करते हैं. यानी जहां आपका डिश और मॉडेम होगा वहां आपको इंटरनेट कनेक्टिविटी मिलने लग जाएगी. दूसरा फायदा इसका ये है कि ग्रामीण इलाकों, जहां पर केबल/फाइबर लाइन या टावर उपलब्ध नहीं है, वहां भी सैटेलाइट इंटरनेट काम करेगा. प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में इसे आसानी से रिकवर किया जा सकता है, जबकि सामान्य इंटरनेट में काफी नुकसान होता है और ठीक करने में बहुत समय लग जाता है.

 

  • सैटेलाइट इंटरनेट के नुकसान को देखें तो अभी ये शुरुआती स्टेज में है इसलिए ये सामान्य इंटरनेट की तुलना में महंगा हो सकता है.
  • अगर मौसम में खराबी हो तो इंटरनेट स्पीड में दिक्कत आ सकती है, क्योंकि इसमें स्पेस से आपको कनेक्टिविटी मिलती है. एक और नुकसान सैटेलाइट इंटरनेट का ये है कि आप इसे सामान्य इंटरनेट की तरह खुद से इंस्टॉल नहीं कर सकते. इसके लिए आपको प्रोफेशनल की जरूरत होगी, जो डिश और मॉडेम को सेटअप करेगा. जबकि आजकल आ रहे एयर फाइबर डिवाइस को आप खुद से सेटअप कर सकते हैं. ये प्लग एंड प्ले पर काम करते हैं.

2025 तक 13 अरब डॉलर की हो जाएगी भारत की स्पेस इकॉनमी

ET की रिपोर्ट के मुताबिक, विभाग से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि Jio और Oneweb को व्यापक स्तर पर टेस्टिंग के लिए सरकार मंजूरी दे सकती है. फिलहाल टेस्ट स्पेक्ट्रम के लिए आए आवेदनों का विश्लेषण किया जा रहा है. एक अन्य अधिकारी ने कहा कि सरकार कंपनियों को टेस्ट स्पेक्ट्रम दे सकती है क्योंकि सैटकॉम में अपार संभावनाएं हैं और भारत इस सेगमेंट में टॉप की भूमिका निभाना चाहता है. अधिकारी ने कहा कि भारत में भले ही सैटेलाइट बेस्ड इंटरनेट सर्विस का मार्केट अभी शुरुआती चरण में हो लेकिन इसकी संभावनाएं काफी हैं, खासकर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में. EY-ISpA की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की स्पेस इकॉनमी 2025 तक 6% की सीएजीआर से बढ़कर 13 बिलियन डॉलर की हो सकती है. 

 

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